Friday, October 24, 2008

उम्मीद वो प्यास हैं जो बुझती नही




दरिया किनारे मैं प्यासा खड़ा था



बीत गई रैना सारी ,बुझी न प्यास हमारी



प्यास जो बुझ गई होती



तो ये जिन्दगी ना फ़िर जिन्दगी होती

1 comment:

Gajendra Singh Bhati said...

देवेंदर।
ये मुसोलिनी का नहीं चे गुवेरा का है.ठीक है तू बोलता है तो देशभक्त पर भी लिखूंगा।

ब्लॉग तो अच्छा है । लिखते रहा करो।

सप्रेम ..गजेन्द्र सिंह भाटी